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गीता अध्याय 13 श्लोक 9 | जन्म मृत्यु और दुखों का सत्य

 


शब्दार्थ
जन्म — पैदा होना
मृत्यु — शरीर का अंत
जरा — बुढ़ापा
व्याधि — रोग
दुःख-दोष-अनुदर्शनम् — इन सब दुःखों का बार-बार चिंतन करना

असक्ति: — मोह न होना
अनभिष्वङ्गः — अत्यधिक लगाव न रखना
पुत्र — संतान
दार — पत्नी
गृहादिषु — घर आदि में

अर्थ
मनुष्य को इस संसार के वास्तविक स्वरूप को समझना चाहिए — जन्म लेना, मृत्यु आना, बुढ़ापा और रोग ये सब शरीर के दुःख हैं। इसलिए भक्त को चाहिए कि वह संसार के मोह में अधिक न फँसे। पुत्र, पत्नी, घर और परिवार से प्रेम तो रखे, परंतु उन्हें ही अपना सर्वस्व न माने। सच्चा आश्रय केवल भगवान हैं। जब जीव संसार की नश्वरता को समझकर श्रीभगवान की शरण ग्रहण करता है, तभी उसके हृदय में शुद्ध भक्ति प्रकट होती है।

 भावार्थ
इस श्लोक में भगवान बताते हैं कि ज्ञान का आरंभ संसार के दुःखों को पहचानने से होता है। जो भक्त जन्म-मृत्यु के चक्र को समझ लेता है, वह संसार में रहते हुए भी भीतर से भगवान में आसक्त रहता है। परिवार और धन से अत्यधिक मोह जीव को भगवान से दूर कर देता है, परंतु जो सबको भगवान की देन मानकर सेवा करता है और अपना हृदय श्रीकृष्ण के चरणों में लगाता है, वही सच्चा भक्त है।

भक्त जानता है कि यह संसार क्षणभंगुर है, इसलिए वह हर परिस्थिति में भगवान का स्मरण करता है और अपने जीवन को भक्ति, सेवा और नाम-स्मरण में लगाता है।

इस श्लोक से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

Bhagavad Gita के इस श्लोक से हमें शिक्षा मिलती है कि यह संसार नश्वर है। जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग जीवन के अटल सत्य हैं, इसलिए मनुष्य को इनसे घबराने के बजाय भगवान की भक्ति में अपना मन लगाना चाहिए।

हमें परिवार, धन और घर से प्रेम तो रखना चाहिए, परंतु उनमें अत्यधिक मोह नहीं करना चाहिए। सच्चा सुख केवल भगवान की शरण और भक्ति में ही प्राप्त होता है।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण, नाम-जप और सेवा करते रहना ही मानव जीवन की वास्तविक सफलता है। 🙏🌸




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