श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 13, श्लोक 10
श्लोक: 13.10
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥
🌸 शब्दार्थ:
मयि — मुझ परमात्मा में
अनन्ययोगेन — एकनिष्ठ योग द्वारा
भक्तिः — भक्ति
अव्यभिचारिणी — अडिग, स्थिर और किसी और में न भटकने वाली
विविक्तदेशसेवित्वम् — एकांत स्थान में रहना, शांत वातावरण को पसंद करना
अरतिः — आसक्ति न होना, रुचि न रखना
जनसंसदि — भीड़-भाड़ वाले सांसारिक लोगों के बीच
🌿 भावार्थ :
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि सच्चा ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति तब प्राप्त होती है जब साधक केवल परमात्मा में अनन्य और अडिग भक्ति रखता है। ऐसी भक्ति जो किसी भी परिस्थिति में विचलित न हो और केवल ईश्वर को ही अपना सर्वस्व माने।
साथ ही, ऐसा साधक एकांत और शांत स्थानों में रहना पसंद करता है, जहाँ उसका मन भटकता नहीं। उसे अधिक भीड़-भाड़, सांसारिक विषयों और व्यर्थ की संगति में रुचि नहीं होती, क्योंकि उसका मन भगवान में ही स्थिर हो चुका होता है।
🌺 आध्यात्मिक संदेश:
इस श्लोक का गहरा संदेश यह है कि भक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और एकाग्रता का नाम है। जब मन संसार से हटकर केवल भगवान में लग जाता है, तभी वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति शुरू होती है।

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Hare krishna
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